Tuesday, December 18, 2007

मेघ जल बरसा...

मेघ जल बरसा,
बुझा -
अंतरित तृष्णा!

चाँद तू खिल जा,
छुपा -
अपनी व्यथा!

पुष्प फिर सुन्गंदिथ हो जा,
भुला -
भंवरों की दशा!

नदिया फिर बह जा,
उठा -
ज्वार अपना!

मन,शून्यता में,
सुझा -
मुझको रास्ता!!!"

6 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 21/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

अनुपमा त्रिपाठी... said...

sunder abhivyakti...

अजय कुमार said...

मेघ जल बरसा,
बुझा -
अंतरित तृष्णा!

सुंदर पंक्तियां , बधाई

Rajesh Kumari said...

megh jal barsa sundar kavita.

रेखा said...

सुन्दर अभिव्यक्ति ....

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

वाह! सुन्दर अभिव्यक्ति...
सादर...

www.hamarivani.com