Tuesday, September 9, 2008

मुझको भी दो न शब्द ,

मुझको भी दो न शब्द ,
मुझको भी कहनी है कविता...
सुर ताल वेदना...
कन कन भेदना...
मट मैले मन के शरीर को,
है अपने अश्रुओं से रेंतना...
आत्मग्लानी से भर भर जाऊं
क्यूँ नहीं कह पाती मैं कविता...
मुझको भी दो शब्द इस्श्वर..
मुझको भी कहनी है कविता...!!!

1 comment:

"SURE" said...

kan kan to aap bhed chuki hai Shireen ji,agar abhi bhi kavita ke liye shabd chahiye to phir ye kaya tha....bahut hi kamaaal ka andajebayan kahunga mai to and really a beautiful poem....keep it up

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