Wednesday, July 1, 2009

हाए हाए ...

बेकार जली, बेकार बुझी, बेवजह मैंने अश्क बहाए,
उसके इश्क में खोकर अपना क्या कर डाला मैंने हाए.

भूके को रोटी,घर बेघर को,बच्चों को तालीम न दी,
मेरे मौला क्या मुझको भी लग जाएगी उनकी हाए.?

मैंने माना जग झूठा है रिश्ते नाते भी ये झूठे हैं,
पर क्यूँ अपनों के खोने पर दिल ये रोता हाए हाए..

बारिश की पहली बूँद ने दिल को था कितना खुशहाल किया,
पानी के एक सैलाब ने लेकिन लेली कितनी जानें ,हाए ...

जो करना है कर डालो जो मेरी मानो तो 'शीरीं',
वक़्त जो ये गुज़र गया तो फिर न रोना हाए हाए

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