Sunday, August 30, 2009

मेघ जल बरसा,

मेघ जल बरसा,
बुझा -
अंतरित तृष्णा!

चाँद तू खिल जा,
छुपा -
अपनी व्यथा!

पुष्प फिर सुन्गंदिथ हो जा,
भुला -
भंवरों की दशा!

नदिया फिर बह जा,
उठा -
ज्वार अपना!

मन,शून्यता में,
सुझा -
मुझको रास्ता!!!"

2 comments:

shiwangi said...

very nice poem

आशुतोष said...

मन,शून्यता में,
सुझा -
मुझको रास्ता!!!

अच्छी पंक्तिया..अच्छे विचार..
बधाई करें स्वीकार

www.hamarivani.com