Wednesday, April 4, 2012

सरल संवाद

मैंने जब तुम से
सरल संवाद जोड़ा था
कब कहा था
प्राण फूंको
मेरे इस आसक्त...
से संकल्प में .....
अप्राप्य था जो
उसे भी प्राप्त करने की
नवोदित प्रेरणा
क्यूँकर जगाई .... ?

2 comments:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह जी! क्या बात है!!!
इसे भी देखें-
‘घर का न घाट का’

S.N SHUKLA said...

सुन्दर सृजन, बधाई.

कृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen" की नयी पोस्ट पर भी पधारें, आभारी होऊंगा.

www.hamarivani.com