Tuesday, February 12, 2013

स्वार्थ

अपने अपने अस्तित्व की लड़ाई में
दिशाहीन ,
खोखला अंतस ....
एक  स्वार्थ की बली
चढ़ गया
बच गया फिर भी
जीवन भर का सारांश
अल्पविराम...
एक निजी !!

1 comment:

दिनेश पारीक said...

हर शब्द की अपनी पहचान बना दी क्या खूब लिखा है
मेरी नई रचना

प्रेमविरह

एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

www.hamarivani.com