Sunday, May 19, 2013

"मैं"

एक मैं
और मेरा अहम्
उस पर
अहम् का अस्तित्व भी
जीवन भर
संघर्षरत सभी
कोई भी जीते
निश्चित है ,
पराजय मेरी
क्योंकि मन पराधीन ...
चेतन होकर भी !?

2 comments:

शालिनी कौशिक said...

बहुत सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति .आभार . मेरी किस्मत ही ऐसी है .
साथ ही जानिए संपत्ति के अधिकार का इतिहास संपत्ति का अधिकार -3

दिगम्बर नासवा said...

मन की स्वतंत्रता ही जीवन का उद्देश्य है ...
इस अहम् से बाहर आना मुक्ति है ...

www.hamarivani.com