Tuesday, January 31, 2012

सवाल जवाब

आज कल ..अक्सर
कुछ सवाल जवाब
मेरे सिरहाने सोये रहते हैं
इस उम्मीद से कि मैं
इन्हें अपने दिल में कोई जगह दूँ ....
मेरे सपनों को नोचते
खरोचते हैं...
पर मैं इन्हें दुत्कार देती हूँ
सदा
क्या खबर
इन सवालों और जवाबों में
खो जाए मेरा वजूद ही....
और मैं रह जाऊं फिर ...अकेली!

Saturday, January 21, 2012

किरण

खिलखिलाओ मन
सृजन का बीज बोया
आज मैनें

हो रही पुलकित किरण ये
मुझ से मिलने आ रही
बादलों की ओट चंचल
प्रिय सी शरमा रही
गुनगुनाओ मन
जगाया भाग्य सोया
आज मैनें

खेत में बिखरी हुई जो
फसल पर इठ्ला रही
सिन्दूरी यह लालीमा
ठिठुरी धरा को भा रही
बहलजाओ मन
है पाया था जो खोया
आज मैनें

नींद से जागी अभी
नव कोपलें अलसा रही
ऋणी हो कोयल कहीं
नवगीत कोइ गा रही
ठहर जाओ मन
धरा पर सुख संजोया
आज मैनें..........

Friday, January 6, 2012

ऊर्जा का स्रोत तुम .....

ऊर्जा का स्रोत तुम
दर्प का हूँ भार मैं

विशाल तुम ह्रदय लिए
सूर्य भांति तप रहे
दूसरों के ही लिए
निःस्वार्थ जीवन जप रहे
क्षमा की एक जोत तुम
त्रुटियों का संसार मैं
ऊर्जा का स्रोत तुम ....

अश्रुओं को सोक लूँ
उम्र ढलती रोक लूँ
बिन तुम्हारे ओ पिता
कैसे जीवन सोच लूँ
सत्य ओत प्रोत तुम
झूठा अहंकार मैं
ऊर्जा का स्रोत तुम...

सूर्य जैसे है सदा
धूप छाँव से बंधा
स्वर्ण सी आभा लिए
तुम दमकना सर्वदा
ज्ञान का उद्योत तुम
विराट अंधकार मैं
ऊर्जा का स्रोत तुम ....

Thursday, December 22, 2011

मैं क्यूँ लिखूं ....

मैं क्यूँ लिखूं

नए साल में अपवाद पुराने

रोती माएँ

ठंडे चूल्हे

भूखे बच्चे

कुछ लोगों की भ्रष्ट सोच पर

शहीद होते

सैनिक सच्चे



क्यूँ लिखूं मैं

जब जानू ना

सूखे खेत की रूठी हरियाली

अपने घर के एक कोने में

बैठकर पीते....

चाय की प्याली ....

मेरा लिखना भर लौटा देगा

क्या लुटी हुई अस्मिताएं ?

फिर भला क्यूँ कर जाऊं मैं

पाखंडी औपचारिकताएं ?

नए साल में नई सोच एक

मुझ में विकसित कर देना

पीड़ पराई जान सकूँ

बस इतनी सी तो है प्रार्थना

कुछ ना हो तो मेरा कागज़

कोरा ही तुम रहने देना !

Wednesday, December 21, 2011

नव वर्ष तुम फिर आओगे !

मैंने पूछा
नव वर्ष तुम फिर आओगे !
क्या लाओगे?
स्वार्थ पुराने उन्हें भुनाने
या फिर कुछ नव ताने बाने
मुझे डराने .....?
वो बोला
मैं तो संघर्ष हूँ
नव वर्ष हूँ
जैसे कर्म तुम्हारे होंगे
वैसा ही तो फल लाऊंगा
सुख दुःख दोनों ही लाऊंगा
डरती क्यूँ हो, सहती क्यूँ हो
नई उम्मीद पर
नए स्वप्न मैं दिखलाऊंगा
विपदा सारी हर जाऊँगा
क्रोध लोभ और मोह ,दंभ के
झूठे चटकारे मत भरना
केवल अपना छोड़ ज़रा सा
औरों का भी चिंतन करना
और जो तुम "नूतन" हो तो
बन कर नूतन ही रहना

Thursday, December 15, 2011

कठिन हुआ है कितना देखो यूँही सरल हो जाना ....

कठिन हुआ है कितना देखो यूँही सरल हो जाना
चलते चलते कितना बढ़ना और क्या है पाना

क्या उचित क्या अनुचित
इस मोह पाश क्यूँ बंधना
क्या मौला क्या पंडित
सब को एक नाम है जपना

फिर क्यूँ बोलो यूँ लड मर कर आप ही खो जाना
चलते चलते कितना बढ़ना और क्या है पाना

हाँ मैं रहती हो कर पुलकित
देख कर रोज़ नया एक सपना
रहूँ क्यूँ हो कर आतंकित
जब न ईश सिवा कुछ अपना

हिम शिखर भी चढ़कर तुने क्या खुद को पहचाना
चलते चलते कितना बढ़ना और क्या है पाना

Sunday, December 11, 2011

हाइकु...

दर्पण टूटा
मुझ से मन रूठा
क्या पहचान

विडम्बना ये
जग झूठा झंझट
राग द्वेश ये

सिंगार धर
सुनती बांसुरिया
राधिका प्यारी

चंदन टीका
सूरज सा दमका
जाग्रत धरा

सुमन नए
टूट के हाए गिरे
कुचले गए

माला पिरोई
प्रिय गठबंधन
ईश्वर संग

मन सुमन
विचार तितली से
सुन्दर क्षण

पुष्प सी खिली
तितली संग नाची
जन्मों की प्यासी

सुन्दर बेल
दीवार पर चढी
अजब खेल
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