Thursday, August 25, 2011

याद...


है याद सिमटी
बंद कमरों में कहीं,
सर्द घाटी और बर्फीली पहाड़ी ,...
खुशनुमा लम्हों की सौगात सी !
गुज़रा वक़्त ही तो है मेरी पहचान भी!...

Saturday, August 20, 2011

समुन्द्र....

समुन्द्र
अथाह समुन्द्र ,
मुझ को अपने मैं छुपा लेने को आतुर
हाँ ये समुन्द्र मेरा अप्रतिम प्रेमी
अपनी लहरों के जोर से पैरों तले
की मेरे मिट्टी को खिंच कर
मुझको बेजान कर देता...
और दो पल को मैं भी उसके साथ हो लेती
आह!
इतना अनुराग! मेरे लिए!
बस मैं भी सुद बुध खो देती !
यकायक याद आता मुझ को मेरा जीवन
और कुछ चित्र
बस मेरा शरीर मुझ को अपने आप रोकने लगता ,
लहरों से झगड़ता
फिर कहीं से दो हाथ आकर मुझ को थाम लेते
और उन्ही में मैं खुद को भींच कर रो लेती
आह! मेरे प्रियवर !
विरह का विलाप करता समुन्द्र
अपनी लहरों को पटकता
शोर करता
डराता ...और डरता
मुंह को मैं छुपा लेती
और मन में उठती टीस को भी
मूंदी हुई आँखों से प्रिय को प्रार्थना करती
"मेरे मृत शरीर को जब तुम
अग्नि पुर्सो..
मेरी राख भरी हुंडी को सहेज कर
न गंगा में ,न मंदिर,न पहाड़ो पर ,
न रेतो में,
बस इसी समुन्द्र मैं कहीं छोड़ आना
मुझे पता है ये मेरी प्रतीक्षा तब भी करता होगा
इसी प्रीति से मुझे पुकारता होगा

कृष्ण बनो तो...

तुम
अधरों पर धर मुरली
धुन नई छेड़ो
मैं
पुनः सब स्मृतियाँ छोड़
तुम्हारे चरणों में आजाऊं
पुलकित हो आऊं
प्रिय तुम ...
इस युग के कृष्ण बनो तो
मैं राधा बन जाऊं ......!

Wednesday, August 10, 2011

चुप

तुम कितना चुप रहती हो
जब चुप रहती हो क्या सोचती हो
या चुप्पी के लम्हो मे तुम कुछ
सोच भी पाती नहीं हो
या सोच के समन्दर मे खो कर
खुद को खोज ही पाती नहीं हो
और इसलिये शायद कुछ
बोल ही पाती नहीं हो……॥

Wednesday, August 3, 2011

मैं साधक ..




हा
मुझ को भी हो जाना है
साधक विलीन ...
स्वच्छंद ....निश्छल
स्वाधीन !
बंधन में बंधना
क्या हो जाना है
लक्ष्य विहीन
कैसे हो जाता कोई साधक
है स्वप्निल जीवन अर्थहीन ....
जो साधन पथ पर लेता
अपनों से
सुख छीन... !
हा
मैं तो हूँ साधक,
नहीं मुझ में भावना... हीन
कर्त्तव्य मार्ग के रश्मि रथ पर हूँ आसीन .....
मैं साधक विलीन !

Wednesday, July 27, 2011

नई बात होती है ...!

जब कभी रात होती है
कुछ नई बात होती है

अँधेरा भी सुकून देता
जो मुलाक़ात होती है

दरिंदों की नहीं ग़लती
ये उनकी ज़ात होती है

कोई जो होंसला रखले
उसकी कायनात होती है

नहीं है फ़र्क इन में भी
ये शे येही मात होती है

बिछडेंगे ये सोचें क्यूँ
ये भी कोई बात होती है

कभी हँसना कभी आंसू
अजब हयात होती है

सभी से फ़ासला रक्खें
दोस्ती खैरात होती है

खो जाए तो दूंढ़े कौन
गज़ल सौगात होती है



Tuesday, July 26, 2011


समंदर तू मुझे अपनी यही गहराइयाँ देदे,
तेरी मोजों की ये सिलवट यही उचाइयां देदे


बदल जाएगा हर मौसम मगर तू है वही
मुझे अपनी यही आदत यही तन्हाइयां देदे


किसी मंज़र के गुम होने का ग़म नहीं मुझको
पर ये क्या की बदले में मुझे रुस्वाइयां देदे


कभी बेलौस मस्ती में कोई तो शाम निकले
लबों के ज़र्द होने तक, कुछ, नई रुबाइयां देदे
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