Thursday, February 7, 2013

कर्मठ 'कविता'....

सभी कर्मयोगी थे
मैं न जाने कैसे
शिथिल सी बन
इधर उधर गिरती पड़ती बैठी बैठी
अनगिनत स्वप्न
...बुन चली
और मार्ग मार्ग पर कठिनाई का
एक चिट्ठा तक लिख डाला
और नाम दे दिया
मेरी 'कविता '
क्या कविता का सृजन
मात्र इतना भर था ....?
या फिर सृष्टि की उत्पत्ति जितना
ही
क्लिष्ट ?
या वृक्ष की छाया जैसा
नदिया की कल कल
बगिया में कुमुद कुमुद लहराती
मधुर मनचली सुगन्धित बेला ..ज्यों
..सरल ?
जैसा भी था
मेरी अनुभूति का सुखद अनुभव
अंजुरी भर मेरे स्वप्न .....
फिर भी कर्मठ थी
.... 'कविता'....

Tuesday, February 5, 2013

समाधान

क्यूँ समाधान खोजने निकल पडता है
हर बार ..जीवन ,
क्या मार्ग पर बढ़ते रहना ही नहीं
केवल ध्येय,
क्या लक्ष्य
नहीं कर देता सीमित
मन विराट...
ब्रह्माण्ड सी सोच का
कर रहा जीवन चक्र, ध्येय ,लक्ष्य ...,
....आदर्श विलुप्त ?
... और फिर भी लक्ष्यहीन
भोगता रह जाता
समाधान की खोज भर में
.... आजीवन कारावास ...यह मन

Monday, January 28, 2013

व्यापकता

व्यापकता के झोल झाल में
कविता की तो नींव हिल गई
उलझी जंगल के झाड़ फूस में
पेड़ों में अक्सर लुप्त हुई
ऊँचे टीले आसमान की
ख़ाक छानती
शुब्ध हुई
बिरहन बन सब रंग
खोती
बंधन मुक्त नहीं हो
पाई
सागर के मंथन में भी
न सीख सकी कुछ न
दिख पाई
एक व्यापक होनहार कविता
न हो पाई
न हो पाई !


Friday, January 25, 2013

शून्यता में खोजता



हूँ शून्यता में खोजता मैं,
एक नई ही प्रेरणा..
मैं प्रश्‍न हूँ ,विचार हूँ,
या स्मृति की वेदना...



हाँ !मैं पंख हूँ और मुझे,
विलोम कण है भेदना..
या त्रुटि शूल हूँ मैं,
स्वयं ही को छेदता






सुवास हूँ मैं रंग हूँ,
विहग की हूँ चेतना,
ग्लानि नहीं,हूँ प्रयास,हूँ
भंवर मधु से खेलता...



विश्वास हूँ मैं राम हूँ,
भक्त की हूँ प्रार्थना..
मृत्यु नहीं, जीवन नहीं,हूँ
गृहस्थ मैं सन्यास सा....!


Monday, January 21, 2013

सत्ता

"क्या दीख पड़ता है कहो
सत्ता के रेशे रेशे से ...
टपकता खून
और नयन भर आंसूं ?
छोटे छोटे सपनो की
लाशों पर पड़ी सूखी
चन्दन की लकडियाँ ?
या रुढ़िवादियों की
जनि कुरीतियों पर
निर्दोष चीखें ?
हाँ ! मगर सत्ता तो विराम ले बैठी है
वन्हीं की वन्हीं
यही निर्लज्जता की पराकाष्ठा "
तो क्या ले लें हम अपने
हाथों में स्वयं, सत्ता ?
"कैसे
निजी व्यवस्थाओं का
सामाजिक अवस्थाओं का
क्या होगा ..अभी नहीं ....
"मैं" सब समझती  हूँ
पर भयभीत हूँ 'मैं'
जो जैसा है वैसा सही"

समानताएं

मैं केवल समानताएं
ढूंढती थी
तुम में और मुझ में
क्या पाया मैंने
अबोध से कुछ आचरण
और सहमे सहमे कुछ स्वप्न
उधेडबुन में इसकी कौन किसका रक्षक
लेकिन फिर भी था कुछ
निरंतर होता घटित
जब यह बंधन मतवाला
करता निस्वार्थ अभिनन्दन
एक दुसरे की सत्ता का
निर्भीक समर्थन

Monday, September 3, 2012

माँ तुझको क्यूँ लगता है

माँ तुझको क्यूँ लगता है
मैं सुलझी हूँ

पूरा दिन बैठ सोफ़े पर
लेपटोप को तकती
दूरभाष पर हंसी ठिठोली
हूँ कितना मैं करती
इस टीवी के स्वप्न लोक
में उलझी हूँ
माँ तुझको क्यूँ लगता है
मैं सुलझी हूँ

छोड़ दिया है पैदल चलना
पहिये चार की गाडी है
थोड़ा सा जो श्रम कर जाऊं
सरपट दौड़ती नाड़ी है
जीवन को मैं सतत मशीनी
समझी हूँ
माँ तुझको क्यूँ लगता है
मैं सुलझी हूँ

बारिश धूप सर्दी और गर्मी
कुछ भी सहन नहीं होता
हीटर एसी उपलब्धि है
या बीमारी को न्योता
बंद खिड़की से सावन
तकती रहती हूँ
माँ तुझको क्यूँ लगता है
मैं सुलझी हूँ


हाँ चाँद को छू आये हम
यह अपनी उपलब्धि है
कितनी जाने बचा सकें
जब विपदा कोई पड़ती है
लेकिन क्या मैं प्रगति का
अर्थ ही ना - समझी हूँ
माँ तुझको क्यूँ लगता है
मैं सुलझी हूँ
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