Sunday, July 24, 2011

गया कोई

कर के वादा निभा गया कोई

हाए !मुझको भुला गया कोई


है जो काली ये रात क्या कीजे

जलता शोला बुझा गया कोई


कोई होगा न बुरा उस सा यहाँ

मुझ को मुझ से चुरा गया कोई


मंजिलें ग़ुम सफ़र लम्बा है

नक़्शे-पा ही मिटा गया कोई


उन बारिशों की ख़बर किस से लें

जिन से मुझ को भीगा गया कोई


कितना बैचन आज फिर दिल है

रो के , मुझ को रुला गया कोई


Monday, July 4, 2011

सत्य भी तो निरपेक्ष नहीं,
अटल.... अमर
कभी नहीं
इस को करे परिभाषित कौन ?
इसे स्वीकारे बस एक मौन!

Thursday, May 19, 2011


संवाद भर से क्या

हो जाता है कोई परिचित,

और परिचित होकर ऐसे

हो जाता है परिभाषित....

हाँ मनुष्य की सोच

ही तो है सीमित

ऐसे तो होती गढ़ित केवल..

कल्पना, किंचित.....

Wednesday, April 13, 2011


किसी आवाज़ का मोहताज ना हो जाए तू,

है मुमकिन किसी को याद भी ना आए तू


सफ़र में होके मुसाफिर की तरह ही रहना,

क्या ज़रूरत किसी के दिल में उतर जाए तू


किया है उस से जो वादा तो निभा भी लेना,

दिल की बातों में आकर ना मुकर जाए तू.


बुरा नहीं यूँ बनाना नये रिश्ते लेकिन

अज़ल से हैं जो उन्हे ही निभा ना पाए तू


मरके बन जाना है गर्दिश का इक तारा लेकिन,

जीकर भी तो किसी घर का दिया जलाए तू


बदल रहा है ज़माना ज़रा तू भी तो बदल

क्यूँ बूढ़ी रस्म का हर वक़्त जशन मनाए तू

Monday, April 11, 2011

आस पास हूँ


हाँ तेरे आस पास हूँ,

मैं आज फिर उदास हूँ ,!


छू भी ना पा सकूँ तुझे,

मुझको लगा मैं ख़ास हूँ,!!?


नज़रों में तेरी आ सकूँ,

अब मैं बस ये आस हूँ,!


यूँ तो ना बेख़बर रहो

ख़ामोश एक एहसास हूँ,!


तू खुदा हुवा तो क्या हुवा

तिरे इल्म की मैं प्यास हूँ!!

Wednesday, March 16, 2011

मम्मा हॅपी होली....


वो अपने नन्हे हाथों को गालों पर धर बोली,

आओ ना मम्मा हम तुम मिलकर खेलें होली

मैं घबराई फिर एक उसको डाँट लगाई

घर गंदा होगा दाग ना हटेंगे तुम तो हो भोली,

कैसी होली

मेरी थोड़ी बात समझ कर फिर वो बोली,

मुस्काई,रंगो की अपनी उठा के पोटली,

खींच के मुझको दरवाज़े पर ले आई

चलो मम्मा गार्डेन मैं चलकर खेलें होली

ऐसी होली

मेरा मन बहका मैं साथ में उसके होली

जैसे ही मैने दरवाज़े की चिटकनी खोली

नीचे बोर्ड पर लगे नोट की याद आई

हज़ार रुपए का ज़ुर्माना जो गार्डेन में खेली होली

कैसी होली

बस उतनी सी देर में वो जी भर कर रोली

अब कैसे खेलेंगे मम्मा हम तुम होली

बॉल मान को कैसे मैने ढेस लगाई

मैने अपनी बातों मैं थोड़ी मिशरी घोली

हम तुम दादी के घर खेलेंगे अगली होली

खूब करेंगे मनमानी ,मस्ती,मैं बोली

उसके प्यारे मुख पर मुस्कान जग आई

चढ़ क्र मेरी गोद मैं बोली मम्मा हॅपी होली......

Wednesday, February 2, 2011

रुक जाओ


सुनो, रुक जाओ ना...

क्यूँ अपने हाथों से,

करते तार तार उसकी गरिमा

जिसने पाला,

महीनों अपने कोख मे,

सींचा अपने रक़्त से

तुम पर अपने स्वप्न बुने

तुमने ,

उसे शरीर मात्र बना,

मार्ग पर फेंक दिया

छीन लिया सर्वस्व उसका,

कर नग्न,

भेद शरीर ,आत्मा !!!!

और तुम ...छोड़ दो विलाप..

उठ खड़ी हो जाओ

उखाड़ फेंको विचार ...

वो जो न दे सम्मान....!

नर या नारी से पहले

हो मनुष्य

अंश ईश्वर का...उसकी कृति ,

क्यूँ भेदभाव इतना ...!?


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