अधरों पर धर मुरली
धुन नई छेड़ो
मैं
पुनः सब स्मृतियाँ छोड़
तुम्हारे चरणों में आजाऊं
पुलकित हो आऊं
प्रिय तुम ...
इस युग के कृष्ण बनो तो
मैं राधा बन जाऊं ......!
शब्द मेरा उत्साह ... छंद मेरी वेदना , जीवन मरण ये असाध्य दुःख , केवल कविता ही आत्म सुख !!!
कर के वादा निभा गया कोई
हाए !मुझको भुला गया कोई
है जो काली ये रात क्या कीजे
जलता शोला बुझा गया कोई
कोई होगा न बुरा उस सा यहाँ
मुझ को मुझ से चुरा गया कोई
मंजिलें ग़ुम सफ़र लम्बा है
नक़्शे-पा ही मिटा गया कोई
उन बारिशों की ख़बर किस से लें
जिन से मुझ को भीगा गया कोई
कितना बैचन आज फिर दिल है
रो के , मुझ को रुला गया कोई