रहा
सरल साश्वत
प्रेम तुम्हारा
तब भी ,जब
पथिक जीवन
विकल हो
बदला कण कण ....
हर क्षण
रहा मग्न
खोजने में नींव ही को ...!
शब्द मेरा उत्साह ... छंद मेरी वेदना , जीवन मरण ये असाध्य दुःख , केवल कविता ही आत्म सुख !!!
Friday, April 13, 2012
Thursday, April 12, 2012
"मेघ न बरसा रोया मौन"
मिटटी तो उपजाऊ थी...
पर लुट कर उस में खोया कौन
भूख निगलता
आप ही गलता
सरल भाव सा
सड़े घाव सा
उसे कोई समझाओ जी
मेघ न बरसा रोया मौन
मिटटी तो उपजाऊ थी
पर लुट कर उस में खोया कौन
मूर्छित तन मन
किंचित कण कण
बीज बो रहा
भाग्य सो रहा
कांटो से उसे छुड़ाओ भी
खेत बंजर अमीर हैं लॉन
मिटटी तो उपजाऊ थी
पर लुट कर उस में खोया कौन
पर लुट कर उस में खोया कौन
भूख निगलता
आप ही गलता
सरल भाव सा
सड़े घाव सा
उसे कोई समझाओ जी
मेघ न बरसा रोया मौन
मिटटी तो उपजाऊ थी
पर लुट कर उस में खोया कौन
मूर्छित तन मन
किंचित कण कण
बीज बो रहा
भाग्य सो रहा
कांटो से उसे छुड़ाओ भी
खेत बंजर अमीर हैं लॉन
मिटटी तो उपजाऊ थी
पर लुट कर उस में खोया कौन
Wednesday, April 4, 2012
सरल संवाद
मैंने जब तुम से
सरल संवाद जोड़ा था
कब कहा था
प्राण फूंको
मेरे इस आसक्त...
से संकल्प में .....
अप्राप्य था जो
उसे भी प्राप्त करने की
नवोदित प्रेरणा
क्यूँकर जगाई .... ?
सरल संवाद जोड़ा था
कब कहा था
प्राण फूंको
मेरे इस आसक्त...
से संकल्प में .....
अप्राप्य था जो
उसे भी प्राप्त करने की
नवोदित प्रेरणा
क्यूँकर जगाई .... ?
Tuesday, April 3, 2012
ज्ञात है ....
वह सरोवर में जो मयंक अभिज्ञात है
कहीं दूर थोडा
या वह वृक्ष पर स्वर्ण सा पत्ता
जो टूटा ...जुड़ा थोडा
क्या उसी में तुम कहीं छुप कर बैठे हो
इस वायुमंडल में
जहाँ बन जाते हैं स्वप्न के अनेक महल
या फिर उस सुगंध में
जो मंदिर की प्रज्ज्वलित बत्तियों से
मुझ तक पहुंचती है
तुम हो ...यह ज्ञात है
निकट ही .....अन्तरंग कहीं
छुपते छुपाते हो
स्वतः क्यूँ नहीं दृश्य हो जाते हो
या चाहिए तुम को अनगिनत वर्षों का मौन
या असाध्य बने रहने की तुम्हारी प्रवृत्ति
तुम से छूटती ही नहीं ?
कहीं दूर थोडा
या वह वृक्ष पर स्वर्ण सा पत्ता
जो टूटा ...जुड़ा थोडा
क्या उसी में तुम कहीं छुप कर बैठे हो
इस वायुमंडल में
जहाँ बन जाते हैं स्वप्न के अनेक महल
या फिर उस सुगंध में
जो मंदिर की प्रज्ज्वलित बत्तियों से
मुझ तक पहुंचती है
तुम हो ...यह ज्ञात है
निकट ही .....अन्तरंग कहीं
छुपते छुपाते हो
स्वतः क्यूँ नहीं दृश्य हो जाते हो
या चाहिए तुम को अनगिनत वर्षों का मौन
या असाध्य बने रहने की तुम्हारी प्रवृत्ति
तुम से छूटती ही नहीं ?
Friday, March 30, 2012
हर क्षण .....जीवंत
विनम्र रहते हैं
विस्मित हो जब टूट कर
औन्धे मुंह ... धंसे रहते हैं
गर्म मिटटी में
तब भी
विनम्र रहते हैं स्वप्न .....
पुनः पूर्ण होने की अभिलाषा से॥
रहते हैं हर क्षण .....जीवंत
विस्मित हो जब टूट कर
औन्धे मुंह ... धंसे रहते हैं
गर्म मिटटी में
तब भी
विनम्र रहते हैं स्वप्न .....
पुनः पूर्ण होने की अभिलाषा से॥
रहते हैं हर क्षण .....जीवंत
Monday, March 26, 2012
सूक्ष्म
कितना सूक्ष्म है
यह भेद
शाश्वत और निरंतर ...
हो जाने में
जटिल भी तो कितना
हर क्षण
जब हो
वायु जल आकाश अग्नि
और पृथ्वी से
परे हो जाने को व्याकुल
यह चित्त.......!!
Saturday, February 4, 2012
दोहे
मौसम आये जाए पर ,सब सहना चुपचाप
नारी जीवन वृक्ष सा ,व्यर्थ न कर संताप
कितने आंसू पी रहा , एक बेटी का बाप
मान रहा वो आज भी ,लड़की को अभिशाप
नहीं सरल रहना वहां ,हो निश्छल निष्पाप
सब लेकर जीते जहाँ ,अधम सोच की छाप
साधन पथ पर बढ़ चला ,फिर भी मन घबराए
जोत जले जो भक्ति की ,श्याम भी मिल जाए!
मैला इसको तू करे, धरा न कूड़ा दान
आश्रय सबको दे रही ,रखले थोडा मान
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