Thursday, May 29, 2014

उदास मन



आज मन बहुत उदास है !!शरीर को छूने वाले हाथ काँपे नहीं होंगे क्या ! उसको नंगा करते हुए उसकी नसों पे दबाव डालते हाथ पैर बाँधते घसीटते हुए जब ले गया उसे तो कौन सा जानवर था उस मर्द के भीतर ? आख़िर क्या है बलात्कार ? स्त्री देह की इच्छा मात्र ? या वासनाओं की तृप्ति ? या फिर शायद ख़ुद को आदम साबित करने का एक भरसक प्रयास करता है मर्द ? किस ग़ुरूर में जीता है यह मर्द ? कि जैसे हमारे समाज में आज की औरत का ऐसा होना मर्द की देन रहा वैसे ही तो मर्द का मर्द हो जाना भी तो औरत के हाथ रहा होगा ? क्यों दी आज़ादी हमने मर्द को सोचने की कि ये उसकी सत्ता है ? कि वो देख सकता है औरत को किसी मजबूर असहाय स्थूल भोगने की वस्तु की तरह ?क्यों दी आख़िर सीता ने अग्निपरीक्षा?कौन से ऋत का पालन करते आगे बढ़ रहे हैं हम? हम औरतों में सोचने वाली क्षमताएँ कहां गईं? कौन से प्रयास होने चाहिए थे दृष्टिकोण बदलने हेतु? दलित कहाँ केवल , हमारे पढ़ें लिखे इलाइट समझे जाने वाले समाज में भी तो यही हश्र है सोच का ! हम औरतें ही तो बीज बोतीं हैं अपनी अगली पीढ़ियों के मन मस्तिष्क में कि लड़की कमज़ोर हैं और डर कर जिए! अपनी अस्मिता को किसी भी तरह छुपा कर बचा कर रक्खे! जबकि ध्यान अधिक उसके अस्तित्व की खोज पर होना था ! सोच को केंद्रित किया जाना चाहिए था उसके मन में अपने पैरों पर खड़े होने की लालसा जाग्रत करने पर ! केवल शिक्षा ही इस शोषण से बचा सकती है अब ऐसा नहीं लगता ! औरत को पत्थर उठाना सीखना होगा ! मर्दों की बनाई दुनिया में महज़ खानापूर्ती का नाम औरत नहीं ! सहनशीलता की देवी कब तक बने रहना होगा ? आज मानवता दोराहे पर खड़ी है ! सही रास्ता दिखाना होगा ! जिसे फ़र्क़ नहीं पड़ता उसे भी सोचने पर मजबूर करना होगा ! देखो कैसे दुहाई दे रही हैं पेड़ से लटकती लाशें ! खोखली हो गईं सारी ऋचाएँ सारे वेद पुराण ग्रंथ ! अब विश्वास नहीं किसी पौराणिक गाथा पर ! रचना होगा समाज फिर नए ढंग से ! अपनी ही मान्यताओं को झकझोरना होगा ! ! लाना तो होगा ही अब बड़ा बदलाव ! सर्व प्रथम अपने भीतर ही !!

Sunday, December 15, 2013

तुम्हारी भूल

भूल तो तुम्हारी है 
क्यूँ दे दी तुमने 
अग्नि परीक्षा 
क्यूँ हाथ जोड़े
अश्रु बहाए...
क्यूँ नहीं भस्म कर डाला
तुम पर लांछन लगाते 
असुरों को ...
हाथों हाथ 

तुम्हारे सतयुग से तो कलयुग
यह मेरा भला है !!
जहाँ मुझको यह तो पता है
'राम' से हटकर भी
मेरा अस्तित्व है
नहीं लादती मैं ख़ुद पर
'राम' की मर्यादा का बोझ
नहीं आँक सकता
हर कोई मुझे
हर बार
बेबात

पर फिर भी
तुम्हारी उस एक भूल
की सज़ा
भुगत रहीं हैं आज
हज़ारों 'निर्भया'.....
कौन कब कैसे प्रताड़ित हो
किसे पता
वैसे भी
हर कोई मेरे 'राम' जैसा
'राम' भी तो नहीं होता ......!!

Thursday, June 20, 2013

विषैली

विषैली हो गईं हैं
ज़बाने
सोच
यहाँ तक की
स्मृतियाँ भी
मशीनों पर लगी जंग सी
कडवाहट ही फैली है
अब हर ओर
कितना शोर
और
जो संबंधों में तकनीक
समाई है
सो विलुप्त है अब बचा कूचा
सामंजस्य का बोध
लो अब ढोना
मानवता की मृत
भावनाओं का बोझ
अंत तक  .....

Wednesday, June 19, 2013

कुछ यूँ

कुछ यूँ हिलती डुलती
ज़मीनों का
सच
प्रत्यक्ष होने लगा है
और
... नदियों में उफान का
रेतीले बवंडरों का
या कि
समुद्री तूफानों का .....
हाँ सच तो केवल एक है
युगों से युगों का सफ़र
निरंतर अवश्य ....
परन्तु
अनंत तो नहीं .....

Sunday, May 19, 2013

"मैं"

एक मैं
और मेरा अहम्
उस पर
अहम् का अस्तित्व भी
जीवन भर
संघर्षरत सभी
कोई भी जीते
निश्चित है ,
पराजय मेरी
क्योंकि मन पराधीन ...
चेतन होकर भी !?

तू...

हाँ कि बगिया सा महकता है
तेरी ममता का आँचल यूँ
तेरी गोद ही में सर रख लूँ
मेरी तो बस ये जन्नत है

मेरे सपने तेरा मक़सद
तू कब ख़ुद के लिए जीती
बिना माँगे जो हो पूरी
तू एक प्यारी सी मन्नत है

मुझे डर है....

खो जाने का डर नहीं
मुझे डर है
सोच न पाने का !
क्या होगा तब
जब दृष्टि की सीमाओं को
लाँघ नहीं पाएगा मन
जब अल्साए सूरज की
किरणों तक को छू न पाएगा
या कि बिन माँ के बच्चों संग
ख़ुद भी बिलख न पाएगा !
... और वो
पंछी की उन्मुक्त उड़ान
या न चाह कर भी
कभी न रुक पाए उस
शापित जीवन का एहसास
...नहीं कर पाया तो ?
होने न होने में मेरे
अंतर क्या
रह जाएगा! ?
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