Thursday, June 20, 2013

विषैली

विषैली हो गईं हैं
ज़बाने
सोच
यहाँ तक की
स्मृतियाँ भी
मशीनों पर लगी जंग सी
कडवाहट ही फैली है
अब हर ओर
कितना शोर
और
जो संबंधों में तकनीक
समाई है
सो विलुप्त है अब बचा कूचा
सामंजस्य का बोध
लो अब ढोना
मानवता की मृत
भावनाओं का बोझ
अंत तक  .....

Wednesday, June 19, 2013

कुछ यूँ

कुछ यूँ हिलती डुलती
ज़मीनों का
सच
प्रत्यक्ष होने लगा है
और
... नदियों में उफान का
रेतीले बवंडरों का
या कि
समुद्री तूफानों का .....
हाँ सच तो केवल एक है
युगों से युगों का सफ़र
निरंतर अवश्य ....
परन्तु
अनंत तो नहीं .....

Sunday, May 19, 2013

"मैं"

एक मैं
और मेरा अहम्
उस पर
अहम् का अस्तित्व भी
जीवन भर
संघर्षरत सभी
कोई भी जीते
निश्चित है ,
पराजय मेरी
क्योंकि मन पराधीन ...
चेतन होकर भी !?

तू...

हाँ कि बगिया सा महकता है
तेरी ममता का आँचल यूँ
तेरी गोद ही में सर रख लूँ
मेरी तो बस ये जन्नत है

मेरे सपने तेरा मक़सद
तू कब ख़ुद के लिए जीती
बिना माँगे जो हो पूरी
तू एक प्यारी सी मन्नत है

मुझे डर है....

खो जाने का डर नहीं
मुझे डर है
सोच न पाने का !
क्या होगा तब
जब दृष्टि की सीमाओं को
लाँघ नहीं पाएगा मन
जब अल्साए सूरज की
किरणों तक को छू न पाएगा
या कि बिन माँ के बच्चों संग
ख़ुद भी बिलख न पाएगा !
... और वो
पंछी की उन्मुक्त उड़ान
या न चाह कर भी
कभी न रुक पाए उस
शापित जीवन का एहसास
...नहीं कर पाया तो ?
होने न होने में मेरे
अंतर क्या
रह जाएगा! ?

Wednesday, February 20, 2013

विधाता

हे विधाता
संदेह है
मुझको
क्या परस्पर किसी विरोधाभास
में
मनुष्य रचा तुमने
संवेदनाओं की वेदी चढ़ा इसे
अनगिनत भूमिकाओं में बाँध
तुम हुए विलुप्त यूँ कि
हाथ भी नहीं आते अब
और एक दिन इसी मृत्यु  जीवन
के संघर्ष में
भूल जाएंगे तुम्हे
और तुम्हारा होना न होना
हमारे हाथ होगा
फिर क्या रहोगे तुम विधाता
इसी तरह दीप्त ...?

Tuesday, February 12, 2013

स्वार्थ

अपने अपने अस्तित्व की लड़ाई में
दिशाहीन ,
खोखला अंतस ....
एक  स्वार्थ की बली
चढ़ गया
बच गया फिर भी
जीवन भर का सारांश
अल्पविराम...
एक निजी !!
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